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सीता नवमी : – हमारे पुराणों में जिन आदर्श नारियों का उल्लेख मिलता है, उनमें से एक हैं माता सीता। श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमी के ठीक एक महीने बाद उनकी अर्धांगिनी माँ सीता का जन्मोत्सव आता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सीता नवमी मनाई जाती है। इसे जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

सीता नवमी की तिथि एवं मुहूर्त

  • सीता नवमी 25 अप्रैल 2026, शनिवार को मनाई जाएगी।
  • सीता नवमी मध्याह्न मुहूर्त – 10:38 ए एम से 01:14 पी एम तक
  • अवधि – 02 घण्टे 36 मिनट्स
  • राम नवमी बृहस्पतिवार, मार्च 26, 2026 को
  • सीता नवमी मध्याह्न का क्षण – 11:56 ए एम
  • नवमी तिथि प्रारम्भ – अप्रैल 24, 2026 को 07:21 पी एम बजे से
  • नवमी तिथि समाप्त – अप्रैल 25, 2026 को 06:27 पी एम बजे तक

इसी शुभ मध्याह्न काल में माता सीता की पूजा-अर्चना करना विशेष फलदायी माना जाता है। माँ सीता का जन्म सबसे शुभ माने जाने वाले पुष्य नक्षत्र में ही हुआ था। इस नक्षत्र में जिसका भी जन्म होता है वह बहुत दिव्य होते हैं और स्वयं प्रकृति ही उनका भरण-पोषण करती है।

सीता नवमी तिथि का पंचांग एवं अन्य शुभ मुहूर्त –

  • तिथि – नवमी – 06:27 पी एम तक
  • नक्षत्र – अश्लेशा – 08:04 पी एम तक
  • योग – गण्ड – 11:43 पी एम तक

सीता नवमी के अन्य शुभ मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे

  • इस दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 03 बजकर 59 मिनट से प्रातः 04 बजकर 43 मिनट तक रहेगा।
  • प्रातः सन्ध्या मुहूर्त प्रातः 04 बजकर 21 मिनट से सुबह 05 बजकर 27 मिनट तक होगा।
  • अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 30 मिनट से दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा।
  • विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 06 मिनट से 02 बजकर 58 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन गोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 24 मिनट से 06 बजकर 46 मिनट तक रहेगा।
  • सायाह्न सन्ध्या काल शाम 06 बजकर 25 मिनट से 07 बजकर 31 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन अमृत काल शाम 06 बजकर 29 मिनट से रात 08 बजकर 04 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन निशिता मुहूर्त रात्रि 11 बजकर 34 मिनट से 26 अप्रैल की रात्रि 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन एक विशेष योग – रवि योग बन रहा है, इस दिन रवि योग पूरे दिन रहेगा।
सीता नवमी

सीता नवमी क्या है?

सीता नवमी माता सीता के पावन प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाने वाला एक अत्यंत शुभ और श्रद्धा से जुड़ा पर्व है। यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को आती है और इसे जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता सीता का जन्म हुआ था, जिन्हें धरती की पुत्री और त्याग, धैर्य एवं मर्यादा की प्रतीक माना जाता है। यह पर्व केवल एक जन्मोत्सव नहीं है, बल्कि माता सीता के आदर्श जीवन को स्मरण करने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर भी है। इस दिन भक्तगण व्रत रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और भगवान श्रीराम के साथ माता सीता की आराधना कर अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

सीता नवमी का महत्व

सीता नवमी का सनातन परंपरा में विशेष महत्व बताया गया है। माता सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने से धन, वैभव और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए और अविवाहित कन्याएं योग्य वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से सीता-राम की उपासना करने से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और परिवार में प्रेम व सामंजस्य बना रहता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि इस पावन तिथि पर किया गया व्रत और पूजा अनेक पुण्य कार्यों के बराबर फल प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।

सीता नवमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

सीता नवमी का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व गहन आध्यात्मिक संदेश भी प्रदान करता है। माता सीता का जीवन त्याग, सहनशीलता और अटूट विश्वास का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, फिर भी उन्होंने धर्म और सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ा।

यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न आएं, हमें धैर्य और संयम के साथ आगे बढ़ना चाहिए। माता सीता की आराधना करने से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आध्यात्मिक रूप से यह दिन आत्मचिंतन, भक्ति और आत्मबल को मजबूत करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है, जो व्यक्ति को जीवन के उच्च मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।

सीता नवमी से जुड़ी परंपराएं और उत्सव

सीता नवमी का पर्व देशभर में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में माता सीता और भगवान श्रीराम की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और भजन-कीर्तन, रामायण पाठ तथा कथा का आयोजन होता है। कई स्थानों पर सीता-राम की सुंदर झांकियां सजाई जाती हैं, जो इस पर्व की भव्यता को और बढ़ा देती हैं।

परंपरागत रूप से महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और माता सीता से अपने परिवार की सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। कुछ क्षेत्रों में सामूहिक रूप से कथा श्रवण और पूजा करने की भी परंपरा है, जिससे सामूहिक भक्ति और आपसी प्रेम की भावना को बढ़ावा मिलता है। यह पर्व परिवार और समाज को एक सूत्र में बांधने का भी कार्य करता है।

सीता नवमी की तैयारी कैसे की जाती है?

सीता नवमी की तैयारी एक दिन पहले से ही आरंभ हो जाती है। घर की साफ-सफाई कर उसे पवित्र बनाया जाता है, ताकि पूजा के लिए शुद्ध वातावरण तैयार हो सके। पूजा स्थल को विशेष रूप से सजाया जाता है और माता सीता व भगवान श्रीराम की प्रतिमा या चित्र स्थापित करने की व्यवस्था की जाती है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठते हैं, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूरे दिन व्रत रखने का संकल्प लेते हैं। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे फूल, धूप, दीपक, फल, माला, हल्दी-कुमकुम आदि पहले से ही एकत्र कर लिए जाते हैं, ताकि पूजा के समय किसी प्रकार की बाधा न आए।

सीता नवमी कैसे मनाई जाती है?

सीता नवमी का उत्सव विधि-विधान और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्तगण प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं और मध्याह्न के शुभ मुहूर्त में माता सीता तथा भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं। पूजा के दौरान मंत्र जाप, पुष्प अर्पण, भोग लगाना और आरती करना प्रमुख होता है।

इसके साथ ही भक्त रामायण या सीता चरित्र का पाठ करते हैं और माता सीता के जीवन से जुड़ी कथाओं का श्रवण करते हैं। पूजा पूर्ण होने के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है और परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस पावन दिन को भक्ति भाव से मनाते हैं। इस प्रकार सीता नवमी का पर्व श्रद्धा, संयम और भक्ति का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है, जो व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है।

सीता नवमी के दिन किए जाने वाले कार्य

सीता नवमी के पावन अवसर पर कुछ विशेष धार्मिक और शुभ कार्यों को करने का विधान बताया गया है, जो व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने में सहायक माने जाते हैं। इस दिन भक्तगण प्रातःकाल स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन श्रद्धा एवं नियमों के साथ व्रत का पालन करते हैं।

  • मध्याह्न के शुभ समय में माता सीता और भगवान श्रीराम की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।
  • पूजा के दौरान मंत्र जाप, पुष्प अर्पण, धूप-दीप प्रज्वलित करना और भोग लगाना विशेष महत्व रखता है।
  • इसके साथ ही रामायण या सीता चरित्र का पाठ करना भी अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है, जिससे मन को शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मकता आती है।
  • इसके अतिरिक्त, महिलाएं माता सीता से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

इस प्रकार सीता नवमी के दिन किए गए ये सभी कार्य न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि व्यक्ति के जीवन को संतुलित, सुखमय और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाने में भी सहायक सिद्ध होते हैं।

सीता नवमी पर माँ सीता की पूजा कैसे करें?

वैशाख मास में आने वाली सीता नवमी का दिन माता सीता की आराधना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से माता सीता की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य का वास होता है। विशेष रूप से कन्याओं और विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यंत मंगलकारी माना गया है। आइए जानें इस दिन की पूजा की सरल और प्रभावी विधि –

पूजा सामग्री

सीता नवमी की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री पहले से ही एकत्रित कर लेनी चाहिए, ताकि पूजा के समय किसी प्रकार की बाधा न आए। पूजन में मुख्य रूप से चौकी, पीला या लाल वस्त्र, माता सीता और भगवान श्रीराम की प्रतिमा या चित्र, जल से भरा पात्र, हल्दी, कुमकुम, अक्षत, धूप, दीपक, पुष्प, माला, मौली (कलावा), सुहाग की वस्तुएं, नारियल, मौसमी फल, प्रसाद और श्रद्धानुसार दक्षिणा शामिल की जाती है

पूजा की तैयारी

सीता नवमी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। स्नान के जल में गंगाजल या हल्दी मिलाकर स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और यदि व्रत कर रहे हैं तो पूरे श्रद्धा भाव से व्रत का संकल्प लें।

पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके पवित्र करें और सभी पूजन सामग्री को व्यवस्थित रूप से सजा लें। इसके पश्चात् शुभ मुहूर्त का ध्यान रखते हुए पूजा आरंभ करने की तैयारी करें।

पूजा विधि

  • पूजा प्रारंभ करने के लिए सबसे पहले एक चौकी स्थापित करें और उस पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं।
  • चौकी को गंगाजल से शुद्ध करें और उसके समीप दीपक प्रज्वलित करें।
  • इसके बाद माता सीता और भगवान श्रीराम की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें।
  • अब जल से आचमन कर देवताओं को स्नान स्वरूप जल अर्पित करें।
  • इसके बाद “ॐ श्री सीताय नमः” और “ॐ श्री रामाय नमः” मंत्रों का जप करते हुए माता सीता को हल्दी, कुमकुम और सिंदूर अर्पित करें तथा भगवान श्रीराम को चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं।
  • इसके पश्चात् मौली अर्पित करें, पुष्प और माला चढ़ाएं तथा माता सीता को सुहाग की सामग्री समर्पित करें।
  • धूप और दीप जलाकर वातावरण को पवित्र करें और पूरे समय भक्ति भाव से मंत्रों का स्मरण करते रहें।
  • अब प्रसाद के रूप में फल, नारियल और मिठाई अर्पित करें तथा अपनी श्रद्धा के अनुसार दक्षिणा भी रखें।
  • अंत में माता सीता और भगवान श्रीराम की आरती करें और उनसे अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने की प्रार्थना करें।
  • पूजा के समापन के बाद प्रसाद को सभी में बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें।
  • इस प्रकार श्रद्धा और विधि के साथ की गई यह पूजा निश्चित रूप से शुभ फल प्रदान करती है।

सीता नवमी व्रत कथा

सनातन परंपरा में माता सीता को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है, और उनके जन्मोत्सव के दिन रखा गया व्रत अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति अपने पापों से मुक्त होकर सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति करता है। इसी संदर्भ में एक प्रचलित कथा सुनाई जाती है, जो इस व्रत की महिमा को स्पष्ट करती है।

प्राचीन समय की बात है। एक विद्वान ब्राह्मण देवदत्त अपनी पत्नी के साथ एक राज्य में निवास करते थे। वे अत्यंत धर्मनिष्ठ और सदाचारी थे, जबकि उनकी पत्नी शोभना भी रूपवती थी, लेकिन समय के साथ वह गलत संगति में पड़ गई। एक अवसर पर देवदत्त को दूर देश जाना पड़ा, और उनकी अनुपस्थिति में शोभना के आचरण में गिरावट आ गई। जब समाज में उसकी निंदा होने लगी, तो उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और क्रोध में आकर उसने पूरे गांव को आग के हवाले कर दिया।

इस गंभीर पाप के कारण अगले जन्म में उसे अत्यंत कष्टदायक जीवन मिला। वह एक निम्न कुल में जन्मी, रोगों से ग्रस्त रही और उसे अनेक प्रकार की पीड़ाओं का सामना करना पड़ा। अपने कर्मों का फल भोगते हुए वह भटकती रही और एक दिन अत्यंत भूख-प्यास से व्याकुल होकर एक नगर में पहुँची, जहाँ उस समय सीता नवमी का उत्सव मनाया जा रहा था।

वह लोगों से भोजन और जल की याचना करने लगी, लेकिन उस दिन व्रत होने के कारण कोई उसे अन्न नहीं दे पाया। अंततः एक सज्जन व्यक्ति ने दया करके उसे तुलसी पत्र और थोड़ा जल दे दिया। उसने वही ग्रहण किया, परंतु दुर्बलता के कारण शीघ्र ही उसका शरीर छूट गया। किंतु इस घटना में एक दिव्य रहस्य छिपा था। अनजाने में ही उसने सीता नवमी का व्रत कर लिया था, दिनभर उपवास रखकर केवल तुलसी और जल का सेवन किया। इसी कारण उसे इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हुआ। माता सीता की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। आगे चलकर उसे एक श्रेष्ठ कुल में पुनर्जन्म मिला, जहाँ उसने अपना जीवन भक्ति और धर्म के मार्ग पर समर्पित कर दिया।

यह कथा हमें यह सिखाती है कि श्रद्धा, संयम और व्रत का पालन अनजाने में किया गया भी जीवन को बदल सकता है और व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिला सकता है।

सीता नवमी का संदेश

सीता नवमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी है। माता सीता का सम्पूर्ण जीवन त्याग, धैर्य, मर्यादा और नारी शक्ति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने हर परिस्थिति में अपने धर्म और कर्तव्य का पालन किया, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न रही हों।

यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चाई, संयम और धैर्य का मार्ग अपनाने से ही वास्तविक सुख और शांति प्राप्त होती है। माता सीता ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों को नहीं छोड़ा, जो हमें यह प्रेरणा देता है कि कठिन समय में भी अपने मूल्यों पर अडिग रहना ही सच्ची विजय है।

साथ ही, यह दिन पारिवारिक प्रेम, नारी सम्मान और वैवाहिक जीवन की पवित्रता का भी प्रतीक है। जो लोग इस दिन माता सीता और प्रभु श्रीराम की आराधना करते हैं, उनके जीवन में प्रेम, संतुलन और सकारात्मकता का संचार होता है।

अतः सीता नवमी हमें यह संदेश देती है कि जीवन में धर्म, करुणा और समर्पण को अपनाकर ही हम सच्चे अर्थों में एक संतुलित और सुखी जीवन जी सकते हैं।

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